संघर्ष
By Pushkal Sinha
हो चारो ओर अंधेरा जब,
दिखे न कोई सवेरा तब,
उजाला बन उन रातों का,
सूरज के तेज प्रतापो सा,
बन खुद मशाल जलना होगा।
संघर्ष, साधन करना होगा ।।
अपने अंदर की दाह लिए,
सारे जीवन का घाव लिए,
हर कभी मत मानो तुम,
संग्राम स्वयं से ठानो तुम ।।
हरदम गिरकर उठना होगा,
संघर्ष को साधन करना होगा ।।
तो क्या हुआ तुम टूट गए ?
साथी तुमसे सब छूट गए ?
मनुज की टूटी हाड़ो सा,
मजबूत खड़े पहाड़ों सा,
टूटकर फिर बनना होगा ।
साधन, संघर्ष करना होगा ।।
हो खड़े सामने कृष्ण कोई,
नियति, भाग्य, कपट, छल भी,
हथियार तब भी मत डालो तुम,
बनकर कर्ण दहाड़ो तुम ।
निःशस्त्र भी लड़ना होगा,
संघर्ष को साधन करना होगा ।।
मानव तो आते जाते है,
विचार यही रह जाते है,
जाना है गर कुछ पीछे तो,
खुद से खुद के विचारो को,
बहुत बड़ा बनना होगा,
साधन संघर्ष को करना होगा ।।
छाई जब घर निराशा हो,
न जीने की भी आशा हो,
कौरव पर क्रूधित उन पांडव सा,
मरण पर जीवन के तांडव सा,
तब रौद्र नृत्य करना होगा ।
संघर्ष को साधन करना होगा ।।
By Pushkal Sinha

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