संघर्ष
By Ami Mehta
मंज़िल को पाने की ख़्वाहिश मे
हम रोज़ संघर्ष करते है
आंखे सूजी हुई और नींद अधूरी
फिर भी मेज़ पर रखी किताब पर
नज़र टिकाये बेठते है
दुनिया को अपना नाम बताने के लिए
उसीसे दूर होने लगते है
क्यू है एक नाम के लिए इतनी महेनत
ये सोचते सोचते ही दिन गुज़रने लगते है
महेनत कभी व्यर्थ नहीं होती
यही सोचकर हम अपनी उम्मीद को
कायम रखते है
लगातार असफलता मिलने पर
अजीब से खयाल भी दोड़ने लगते है
पर इसी कश्मकश मे भी
हम महेनत करना नहीं छोड़ते है
आखिर ऐसे मौके रोज़ थोड़ी ना मिलते है।
By Ami Mehta

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