संगिनी
By Aadya Sarawat
बेशक बात ना हो तुम से, बेशक कुछ झगड़ा हो जाए,
कुछ सर पर चढ़ कर नाचूं मैं, कुछ तुम्हारा आपा खो जाए,
पर तनिक भी बाज ना आना तुम, जी भर के मुझे चिढ़ाना तुम,
पर डर इस बात का लगता है, के रूठ कहीं ना जाना तुम,
जो रूठ के फिर तुम जाओगे, फिर मुझे कहां से पाओगे ?
फिर "जीवन अपना कैसा होगा ?",किससे ये प्रश्न उठाओगे ?
पर ज़रा डगमगा जाना ना,और तनिक भी तुम घबराना ना।
जिस पल तुम याद करो मुझको, उस क्षण तुम मुझको पाओगे।
फिर कुछ साझा करना तुम, कुछ मैं भी पीर बताऊंगी,
और वही संगिनी बन कर मैं, फिर से ये साथ निभाऊंगी।
By Aadya Sarawat

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