श्रृंगार
Updated: Dec 2, 2022
By Abhishek Kumar 'Shahi'
आपके अलविदा के साथ ही अपना मुलाकात अंजाना हो गया।
एहसान आपका रहा कि सिफर सा सफर सुहाना हो गया।।
अभी तो कुछ पन्ने ही पढ़े थे थोड़ा और वक्त देता तू।
समय के पहिये मुलाकात को थोड़ी मोहलत देता तू।।
किस काम की चांदनी 'गर सितारों का हो सहारा नहीं।
वो हुस्न ही क्या जिसे एकटक किसी ने निहारा नहीं।।
वो चंचल मृगनयनो के तेज में दीप्ता काजल।
जैसे थाल में सजे पुष्प पर छिड़का हो कोई गंगाजल।
जैसे शुभर् सरोवर में स्वप्न सजाता कोई श्वेत कमल।
जैसे शुभरन समेट स्याही में कवि ने लिखा हो कोई गजल।।
देख ले जो तू आसमाँ को घिर जाए घटाओं से व्योम।
प्रेम से तू फेरे हाथ पत्थर पर पिघलकर वो हो जाये मोम।।
वरन करती हया जब कपोलों छा जाती अद्भूत लाली।
मुखमंडल पर उतरा हो जैसे अस्ताचल अंशुमाली।।
और हलाहल के घटों को जो स्पर्श कर ले तेरा बदन।
फिर विषधर के अधरों से भी हो जाये मधु का प्रस्रवण।।
जो मुस्कुरा दे तू मधुवन में अधित्यका से उतर आए शुभर् निर्झर।
और रूठ जाए 'गर जो बासंती बादियों में आ जाए पतझड़।।
जो वर्तिका से पांव में फहनी भारी पाजेब हो।
जैसे गुलाब के वृन्त पर खिला काश्मीरी सेब हो।।
क्यों विकल हृदय को करती इतना उंगलियां फेर कुंतल में।
जैसे कंकड़ फेंक दिया हो कोई शांत पड़े सरोवर जल में।।
यादों में छप गयी है ऐसे बपचन का जैसे पहला सीखा अक्षर है।
जो नाम लिखा तूने हाथों पर वो आजतक हस्ताक्षर है।।
जब से विचरण करने लगी है तू मेरे ख़्वाब में।
मालूम हो गया मुझे नशा होता नहीं शराब में।।
मैं मुसाफ़िर मंझधार का क्या कहूँ इजहार में ।
किनारों तक जाना है 'गर पांव देना होगा पारावार में।।।
By Abhishek Kumar 'Shahi'

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