श्री राम की अग्निपरीक्षा
Updated: Sep 3, 2025
By Anisha Jain
सिया से बोले रघुनन्दन
मैथिली तुम्हें करता मैं अभिनंदन।
जानता हूँ की सदा तुमने मेरी प्रतीक्षा
फिर भी देनी पड़ी तुम्हें क्यों अग्निपरीक्षा।
कितना पीड़ित है मेरा मन कैसे बताऊँ
व्यथा हृदय की कैसे तुम्हें दिखाऊँ।
समाज के समक्ष तुम्हें कलंक लगे नहीं सकता मैं झेल
इसलिए रचा मैंने ये अग्निपरीक्षा का खेल।
मैं बदल नहीं सकता था विधि का विधान
सबके समक्ष बचाना चाहता था तुम्हारा सम्मान।
विदित था मुझे इस परीक्षा का परिणाम
मेरी सिया है निष्कलंक जानता है ये राम।
वैदेही पावन अग्नि के समान
सीता है मेरा स्वाभिमान।
मेरे हृदय में सदा बसती है जानकी
वो परीक्षा तो थी राम के मान की।
सीता तुम पावनता का दूज़ा नाम
फिर कैसे अग्निपरीक्षा ले सकता ये राम।
सिया जानता ये है मन मेरा
उस अग्नि में जल रहा था राम तेरा।
By Anisha Jain

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