शूर्पणखा
By Abhishek Kumar 'Shahi'
शूर्पणखा
छोटे-मोटे देवों का ,असुरों ,नरों और वानरों का,
देखो जीवन कितना वैभवशाली, महल उनके कितने आलीशान।
आप सृष्टि के सृजन स्वामी ,देवों के देव निष्कामी,
क्यों बीहड़ों में भटकते हो,क्यों विराजते हो शमशान।।
औघड़दानी को व्यथा सुना रही थी ,किस्मत अपनी खोटी पर।
महलों की जिद पर अड़ी थी देवी एकदिन कैलाश के चोटी पर।।
पाषाण बना लो लाख हृदय को क्या नीर नयन का रुकता है?
महामुनि हो या कि महादेव नारी हठ के आगे सब झुकता है।
फिर कौन है ये दो सत्पुरुष जो सम्मोहन माया में न अंधा है।
क्यों कर्ण पसीजते नहीं है ,खड़ी सम्मुख इसके प्रियवंदा है।
इतना मोहक रूप बनाया,बिछाया सौंदर्य का हर विसात।
पर किंचित मात्र भी डिगा नहीं ,दी उल्टे मेरी नाक काट।
सुकुमारो के सच्चरित्र को दोष उसका बता रही थी।
स्वर्ण महल में एक रूपसी रोष अपना जता रही थी।
हां,ये लंका वही महल है ,प्राप्त था जिसे शिव का अभयदान।
वही स्वर्ण महल जिसे मांग था देवी पार्वती ने महादेव से हठ ठान।
आज उस महल में विराजमान है ,एक परमज्ञानी प्रकाण्ड विद्वान।
लेकर असुरों की अभेद्य सेना और पराक्रम का क्षद्म अभिमान।।
सुरलोग सहम से जाते थे, तनिक गंभीर हो जो वो कुछ कहता था।
कल जोड़ काल करबद्ध खड़ा उसके दरबार में रहता था।।
सहसा अचंभित होकर वो, क्रोध में पड़ा मेघ सा चित्कार।
जैसे आकस्मिक विस्फोट से मचा हो कोई हाहाकार।।
कौन है वो दुर्जन दुस्साहसी, जिसने की तेरी ये दुर्दशा।
सुर, नर, नाग ,यक्ष, गंधर्व है या कोई मूर्ख पाताल में बसा।
आदिशक्ति का अवतार है या है स्वयं शिव का सखा।
अपनी करनी घोर विलाप करेगा , बस नाम बता तू शूर्पणखा।।
दैत्यों से भरे दरबार में बोली शूर्पणखा, हे महाराज! हाय!
हे असुरों के सम्बल !आपकी सहोदरा है आज असहाय।
इस लज्जा से बेहतर था आ जाता मुझको यदि मरण।
आपके अधिकृत वन में कर रही थी मैं स्वच्छंद विचरण।।
मुखमंडल पर अलौकिक तेज़ लिए सहसा दिखी एक नारी।
जैसा पूर्णमासी का चाँद लिए हो आसमाँ में विभावरी।।
समस्त श्रृंगार करके अंगीकार अप्सराएं अगर सुसज्जित हो।
फिर भी उसकी आभा के आगे सब के सब ही लज्जित हो।
मूंद लोचन वो पलभर जो परमेश्वर का ध्यान कर दे।
होकर मोहित विधाता भी त्रिभुवन उसको दान कर दे।
सोंचा ऐसी परमसुन्दरी पर होता सम्राटों का एकाधिकार ।
लाकर लंका में उसको दूं लंकेश को एक अनमोल उपहार।
रत्न शोभते राजकिरिटो पर या राजाओं के कुंतल पर।
उन मोतियों का क्या मोल भला जो पड़ा समुंदर के तल पर।
उसका भाग्य भी उज्ज्वल होगा करके लंकेश का वरण।
इस विचार से करने गयी , महाराज मैं उसका अपहरण।
हठात् वज्र सम वार किया मुझपर कुटिल कुठारों ने।
हाय! नाक मेरी काट दी दो उद्दंड मुनिकुमारों ने।
मैंने समझाया, हे मूर्ख!तुने किया है काल का आवाह्न।
मैं राक्षस कन्या हूँ मेरे भ्राता है परमप्रतापी रावण।
मत यूँ उनका उपहास करो।
ऐ तुक्ष मानव तुम डरो-डरो।।
पर मष्तक उनका झुका नहीं।
बाण तूणीर से रुका नहीं।।
राक्षसों के लहू से कर दिया लाल पूरी मेदनी को।
दो सुभाट कुमारों ने उजाड़ महाराज आपकी छावनी को।।
कहता धरा से मिटा दूँगा असुरों का मैं नामों निशान।
चौदह शीष काट डाले उसने जो मारा केवल एक बाण।।
छीन लिया हमसे उसने हमारे दो अनमोल आभूषण।
वन में कहीं निष्प्राण पड़े हैं सैन्य समेत खर और दूषण।।
मेरी नाक कटी नहीं है भ्राता तेज तुम्हारा हारा है।
उन मायावी मानवों ने तुम्हारी शक्ति को ललकारा है।
ऐ परमवीर फिर खड़ग धरो और प्रचंड प्रहार करो।
भय अपना व्याप्त करो जग में ,फिर से भीषण संहार करो।।
उन धृष्टों का चित्कार गूँजना चाहिए मेरे कर्णो में।
वो दोनों मुनिकुमार चाहिए मुझे अपने चरणों में।।
अपने अन्तस् की अग्नि में अब उसको वो जला रही थी।
खर-दूषण की भाँति रावण को काल के सम्मुख बुला रही थी।
पर कौन समझाता मूढ़ को कि वो अपना मतलब भुना रही है।
अतिश्योक्ति से भरा एक अर्द्धसत्य सबको सुना रही है।
कभी रत्नाकर का राम है कभी तुलसी का है गायन।
जीवन की हर व्यथा का रामबाण है रामायण ।
फिर पलटो सखा उन पन्नो बड़ी गूढ़ है ये गाथा।
बांधवो-समेत जलता है रावण, बच जाती पर सूर्पणखा ।
तुम केवल रावण दहन करोगे और सूर्पणखा तुमको छलेगी।
पर मेरे लंकाकांड में रावण संग सूर्पणखा जलेगी।
By Abhishek Kumar 'Shahi'

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