शिकायतें मां की
By Vikas Kumar Lodhi
तू गया था घर से ये कहकर, अब लौटूंगा सपने करके पूरे|
न जाने कैसे सपने है तेरे, जिसने कर दिये कुछ वायदे अधूरे||
तूने कहा था मां हर दीवाली, नई साड़ी मैं दीलाउंगा तुझे अब से|
साड़ी तो तू भिजवा देता है, पर तेरे बिना मेरी दीवाली ही नहीं आई कब से||
अपनी कमाई से तूने, सारा घर चमका दिया|
पर तेरी कमी ने, घर को फिर से खंडहर बना दिया||
मेरा हाथ दुखते देख, तूने कपड़े धोने की मशीन दिलाई|
तेरे ही गंदे कपड़ों बिना, ये मशीन भी मुझे नहीं भायी||
तुझे पढ़ना मैंने सिखाया, पर तेरे जाने से जैसे गिनती भी भूला बैठी हूं|
देख आज भी, तेरे हिस्से की रोटी बना बैठीं हूं||
खैर तू कर तरक्की, तेरी खुशी ही मेरे लिए काफी है|
क्या करुं माँ हूं न, तेरी कमी खलना मेरे लिए लाजमी है||
By Vikas Kumar Lodhi

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