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शायरी

By Mansi


मैं भी वही हूँ तुम भी वही हो

रास्ते भी वही है मंज़िल भी वही है




फिर क्यों नजरे चुरा रहे हो

लगता है दग़ा करके वफाई की कसमें खा रहे हो


By Mansi




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