शायरी
By Vijaykumar Kishanrao Dhamangaonkar
मेरे दिल पर राज करती वह मेरे दिल की मलिका है,
अब फूल किसी भी सेज पर सजे उस पर हक कुदरत का है |
तुम्हारी आँखों में ग़म का रहना लाज़मी है,
हम तो यूँ है कि दर्द-ए-समंदर छिपाए बैठे हैं |
पलकों की नमी भी क्या अजब होती है,
आँख है मझधार और और पलके किनारा होती है |
दूरदराज़ की बारिश की खुशबू मेरी साँसों को दस्तक दे गई,
तेरी जुल्फें इस कदर लहराई की जेठ में सावन बरसा गई |
कोहरे ने दिल में कोहराम मचा दिया,
पुराने जख्मों पर कुछ मरहम तो लगा दिया |
हमारी खता क्या हुई आप इस तरह रुसवा हो गए,
यह शिकायत खुदा की खुदा से कैसे करे आप इस तरह खफा हो गए |
कोहरे की धुंधलाहट यादों के झरोकों से तस्वीर बना गई,
ओस की बुँदे पहली बारिश का अहसास दिला गई |
By Vijaykumar Kishanrao Dhamangaonkar

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