शायद वो तुम ही थे
By Avani Acharya
शायद तुम ही थे जो मेरी बात सुनते थे
तुम ही थे जो मुझे समझते थे
क्योंकि अब तुम्हारे बिना तो मैं चुप सी हो गई हूं
बंद दरवाज़े के पीछे छुपा सन्नाटा जैसे कईं राज़ अपने अंदर समाए रखता है
परंतु कोई उसे खोलने का साहस नहीं करता
डरते हैं सब सच के सामने आने से
मेरा मन भी अब उसी दरवाज़े की तरह इस दुनिया के राज़ छुपाये बैठा है
कोई साहस नहीं करता उसे खोलने का
उस राज़ को जानने का
मुझे पहचानने का
एक तुम ही थे निडर
जिसने जाना था मुझे
मुझसे मिलकर शायद तुम खुद को भी पहचान गए थे
पहचान गए थे तुम्हारे भीतर छुपी आशाओं को , महत्वाकांक्षाओं को
उन्हें पूरा करने की जो इच्छा जागी तुम्हारे अंदर
अब तो तुम भी ख्वाब देखने लगे थे
मुरझाए हुए फूल में जान फूंक दी हो जैसे किसी ने
तुम्हारी वो हँसी याद करके आज भी मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है
बस दुख इतना ही रहेगा कि तुम्हारी महत्वाकांक्षाएं तुम्हारे ख्वाबों को एक ऐसा रूप दे गयीं जिनमें मेरे लिए तिनके जितनी जगह भी न बची।
By Avani Acharya

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