शायद मैं अब घर में रहता हूँ।
By Somya Singh
सत्रह साल की कच्ची उम्र से, मैं खुद को तपते देखता हूँ;
पिता के पदचिन्हों और माँ की आशाओं पर निरंतर खरे उतरता हूँ;
देशप्रेम और अनुशासन ही अक्सर मुझे झकझोरते थे;
दशकों बीत जाने पर प्रत्यक्ष को क्या प्रमाण दूँ,
मैं फौलाद हूँ, चट्टान हूँ, देश का ही तो मान हूँ |
दिन रात की सुध थी मुझको, ना होश था ठोर ठिकाने का;
एक लगन थी, तो खुद को झोंका यूं, कि ना समय था आने जाने
का;
माँ हमेशा दिल मजबूत किए, आंखें कभी ना नम होने देती थी;
समय जंग का हो या शांति का, राह उम्मीद में मेरी तख्ती थी;
आज, जो वर्दी मेरी, सालों से अभिन्न हिस्सा थी;
बिन सिलवट उसे सहेज के, संदूक में अपनी रखता हूँ;
शायद मैं अब घर में रहता हूं |
उषाकाल में बसता टांग के अपना, जब चौखट हर दिन लांघता था;
रात अंधेरी हो जाने पर सरहद के रास्ते नापता था;
शयनकक्ष का सुख मेरी जीवनशैली का हिस्सा ना था;
आज प्रियजनों संग चाय की चुस्की यूंही बैठे जब लेता हूँ;
तो एक ही भावना परम है, शायद मैं अब घर में रहता हूँ;
जाने कितनी छावनियों में, खाया है निवाला टुकड़ों मे,
आज नन्हे हाथों से निवाला खाने का, खुली आँखों से सपना
देखता हूँ;
निश्चय ही अब मैं घर में रहता हूँ
By Somya Singh

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