शामे फिर भी ढलती नहीं
By Nisarg Shah
चलता हि मैं रहता हूं,
रुकने का तो नाम नहीं,
खुद से यह मैं कहता हूं,
है क्या यह काम सही।
सूरज तो ढल जाता है,
शामे फिर भी ढलती नहीं।
आंखें बंद हो जाने पर भी,
जगता मेरा दिमाग है,
रोशनी एसी डालता है जैसे
कोई अलादीन का चिराग है।
सूरज तो ढल जाता है,
शामे फिर भी ढलती नहीं।
न जाने कैसे आया इस मोड़ पे,
ढूॅऺढता मैं वो रास्ता हूं,
वापस कैसे जाऊं अब सब तोड़ के,
खुद मैं जो नहीं, कैसे वो आस्था लाउऺ।
सूरज तो ढल जाता है,
शामे फिर भी ढलती नहीं।
By Nisarg Shah

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