शाम- ऐ- मंजर
By Dr.Trupti Upadhyay
वो भी क्या शाम - ऐ - मंजर था और जब तेरा इंतजार था ।
आज भी वही शाम - ऐ - मंजर है और बस तेरा इंतजार है ।
वो तेरा बेताबी से आना, और मुझे देखकर हँसना ।
वो चलती गाड़ी पे तेरा चुपके से मेरा हाथ पकड़ना ।
वो मेरा पीछे से तुझे बाहोमे लेना और तेरी गहरी सांसे लेना ।
फिर धीरे से हथेली को चूमना और गालो पे एक थपकी देना ।
वो भी क्या शाम - ऐ - मंजर था जब तेरा साथ था ।
आज भी वही शाम - ऐ - मंजर है और बस तेरा ख्वाब है ।
वो सडक के किनारे बैठकर ठेर सारी बाते ।
वो छोटी सी खुशियाँ और ठेर सारी मस्ती।
वो तेरा मेरी परवाह में गुस्सा करना और मेरा तुझे जूठा परेशान करना।
वो तेरा खुलकर हंसना और मेरे लिए बच्चों सा रोना ।
वो भी क्या शाम - ए - मंज़र था जब तू मेरे पास था ।
आज भी वही शाम - ए - मंज़र है और बस तेरा एहसास है ।।
By Dr.Trupti Upadhyay

Comments