शांतिप्रिय लेखक
By Siya Rasik
युद्ध के बारे में लिखते वक़्त मुझे अक्सर intellectual बेबसी का एहसास होता है,
यह बेबसी इतनी गहरी है कि हज़ारों मासूम की मौत मेरे चंद शब्दों में सिमट जाती है,
लोग मुझे शांतिप्रिय लेखक का तगमा दे देते है और फिर शोख़ सभा में मेरी कविता बोलते है।
क़लम क़मज़ोर नहीं होती है, क्यूँकि हर युद्ध से पहले कोई कलम चलाकर लिखता है: “शांति के लिए युद्ध होगा”
युद्ध के बाद भी कलम से ही देश की रखाए बाँटे जाते है, स्कूल कॉलेज में बच्चों को युद्ध पढ़ाया जाता है,
बल्कि अगर कोई कमज़ोर होता है तो वो है शांतिप्रिय लेखक।
शांतिप्रिय लेखक कि मौत भी नहीं होती, वो युद्ध में भी नहीं जाता
वो मासूम भी नहीं है, वो ताक़तवर भी नहीं है
वो बस बेबस काग़ज़ पे लिखता रहता है, शांति क़ायम हो।
अक्सर लोग ‘शांतिप्रिय लेखक’ को उसके युद्ध न करने को मानसिक व्यावहारिक अपंगता से जोड़ देते है,
और युद्ध होता रहता है, सीरिया से ले कर, पैलेस्टायन में, यूक्रेन से ले कर यमन में
पर ‘शांतिप्रिय लेखक’ चुपचाप लिखता रहता है।
फिर किसी दो युद्ध के बीच के काल में,
पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है उन्हीं लोगों के द्वारा जो युद्ध करते हैं।
उसी युद्ध से उनका और मेरा घर चलता है।
By Siya Rasik

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