-शगुन की शाम-
By Sakshi Joshi
आई-आई शगुन की शाम आई,
खुशियाँ मेरे आंगन में फिर मुस्काई!
हुई है सगाई,
अब हल्दी-मेहंदी की बारी आई,
हल्दी से रूप निखारे,
मेहंदी से आँगन महकाई!
लाल जोड़े में सजी-धज़ी,
बिटीया दुल्हन नजर आई!
मंडप सजे हैं,
डोलियाँ सजी है,
देख दर पे बारातें आई!
कन्यादान की शुभ घडियाँ आई!
छोड़कर बाबुल का अंगना,
जा रही है ससुराल वो!
होगी बिदाई बेटियों की,
कैसे आंखे नम न हो!
दूर कहीं परदेस जैसे,
ससुराल में मन लगेगा कैसे!
सबके गले मिलकर रो रही है,
मायके की यादें कुछ,
लम्हों में संजो रही है!
आज राजकुमारीयों की,
बिदाई हो रही है!
डोली में बैठ,शादी कर ससुराल चली है!
By Sakshi Joshi

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