शक्ती
By Purnima Bajpai
क्यों जन्म नहीं लेने देते,
किस गलती की दे रहे सज़ा
कोई बोझ नहीं तेरा मान हूं मैं,
क्यों छीन रहे हो हक़ यूं मेरा
खुशियों का तेरी आगाज़ हूं मैं,
तेरी आन बान और शान हूं मैं
इस तथ्य का है इतिहास गवाह,
ईश्वर से मिला वरदान हूं में
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स्व-भस्म किया था सती ने देह,
शिव के प्रति प्रेम जताया था
खुद देह त्याग कर भी उनने,
बेटी का धर्म निभाया था
तोड़ा अभिमान पिता दक्ष का,
जो खुद वो ना सह पाया था
जब शीश अजा का किया धरण,
तब वह मनुष्य बतलाया था
फिर जीवन उसका हुआ सफल,
जो प्रजापति कहलाया था
थीं शक्ति स्वरूपा बेटी वो,
जिसने मान पिता का बढ़ाया था
राजा एक थे सीरध्वज,
जिहोने पुत्री-रत्न कमाया था
जब मिथिला में था पड़ा अकाल,
तब बड़ा यज्ञ करवाया था
खेत जोत कर उनने फिर,
एक कन्या को वहा पाया था
जिसे देख फिर मेघराज ने,
विदेह- नगरी को हर्षाया था
गोद लिया उस कन्या को,
और सीता नाम रखाया था
अपनी पुत्री जानकी से ही,
उनने जनक नाम को पाया था
थीं भक्ति रूपिणी शक्ती वो,
जिसने पिता के यश को बढ़ाया था
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क्यों जला रहे हो मुझको अब,
क्यों घोंट रहे हो गला मेरा
तेरा भाग हूं मैं, सौभाग्य हूं मैं,
तेरी लाज और सम्मान मेरा
तुझको जीवन देने वाला,
प्रकृति रूपी उपहार हूं मैं
इस तथ्य का है इतिहास गवाह,
'शक्ती' का ही पर्याय हूं मैं
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By Purnima Bajpai

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