शक्ति का एहसास
By Abhilasha Purohit
यदि सही गलत में भेद समझती हो तो सशक्त हो तुम
सब रंगों में सफेद समझती हो तो इंद्रधनुष की समझ हो तुम
गहन अंधकार में भी भीतर की ऊष्मा से चल सको
तो स्वदीप्त पूर्ण समर्थ हो तुम
औरों की खुशियों के लिए झुक सकती हो तो
यकीन जानो कोई डाली नही
बल्क़ि दरख्त हो तुम
मुस्कुराने की आदत हो
लेकिन
आंसुओ से भीगी रखती हो भीतर तक
तो नाजुक नही सख्त हो तुम
समर्थन जताकर भी बता दो कि
कहाँ विभेद रखती हो
तो अविभक्त हो तुम
धीमी आवाज़ से भी शोर का सामना करती हो
तो कमजोर नही विनम्र हो तुम
सामाजिक न्याय में हर क्षण जलती हो
लेकिन
सिर्फ स्नेह से पिघलती हो
वो बर्फ हो तुम
हर रात मरने को आतुर
इसका उसका जाने किस किसका सम्बल हो तुम,
फिर भी,
खुदको यही कहकर रोज सुबह जगने वाली
प्रभात की वो किरण प्रथम हो तुम
मद्धिम सी फैली किरणों के साथ भी प्रखर हो तुम
ध्वेश, ईर्ष्या और घृणा को साक्षी भाव से देखने मे समर्थ हो तुम
क्रोध के चरम पर जाकर जो काली बन जाये
उसी क्षण रक्त की नदियों से मैदान में ही
मासूम को देख अपनी छाती से चिपकाए
ममता का ऐसा लचीला सा दृढ़ स्तम्भ हो तुम
रिसते दूध के साथ भी जो रोजमर्रा के सारे काम निबटाये
ध्वेश के चरम पर
भी इरादे नेक रखती हो,
तो सशक्त हो तुम...
By Abhilasha Purohit

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