वक़्त की कैद में मैं "चक्षु-नीर "
By Kavita Bhatt
वक़्त की हर इकाई को हराकर
थामे थे मैंने चक्षु नीर
ह्रदय की पीड़ा को चीर
दृग पीड़ा की ज्वाला को पीकर
पुतलियों को थमा आयी थी
मैं मन के समस्त हिम-नीर I
शुभ्र-धवल था मेरा आँचल
उसमें छिड़की गयी स्याही
नफरत और अपमान की
फिर भी
निगल लिए सारे ग्रास मैंने
पल पल सहेज लिए कदम वो चंचल
ताकि रहे एक छत ज़िंदा उम्र भर I
कभी सूखा ही नहीं था मन का वो नीर
आत्मा की वो अथाह पीर
बस हिमाद्र बन जमा रहा
रक्त कोशिकाओं में
जकड़ रहा था वो मेरी स्वांस-स्वांस
मानो हो कोई द्वन्द
जीने के स्वांस में और अस्तित्व के स्वांस में I
शरीर की स्वांस जीतती रही हमेशा
पर अस्तित्व की स्वांस मानो
दिन पर दिन घोट रही हो अपना गला खुद ही
दिन युगों से लगे और पल मानो
उनके लिए शायद कोई इकाई बनी ही नहीं हैं अभी तक I
मैं वक़्त की कैद में तेरे मन का नीर-द्वार
तेरा चक्षु
जहाँ हैं कैद तेरे ये चक्षु- नीर I
सदैव से तेरी देहरी और देह के द्वार
दोनों का हमेशा से रखवाला
मैं वक़्त की कैद में तेरा चक्षु-नीर I
By Kavita Bhatt

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