व्यथा नवयुवक अन्नदाता की
By Rajesh Kumar Verma
जो निसि दिन ज्ञान बांटते फिरते, निजीकरण के,
वे भी अपनी बिटिया के लिए दामाद ढूंढते सरकारी।
डॉक्टर, इंजीनियर ,अधिकारी ,मिले न मिले, न सही,
मिले क्लर्क चाहे चपरासी, मगर नौकरी हो सरकारी।
लोग सभी कहते हैं दुनिया का पेट भरता है अन्नदाता,
पर वर के रूप में आज वह, किसी को भी नहीं भाता।
विवाह करने की जब उम्र हुई, सभी पूछ रहे व्यवसाय,
क्या करते हो बेटा,नौकरी करते हो प्राइवेट या सरकारी।
विवाह हेतु ठुकराए जाने पर, टूटता बिखरता बार-बार,
बड़ा पाप है खेती करना, यह जाना उसने पहली बार।
बड़े गर्व से वह कहता था, खेती करना ही है मेरा काम,
जब सच्चाई से हुआ सामना, सारा गर्व चकनाचूर हुआ।
खेती करते-करते टूट गए, थे जो दिल के अरमान कभी,
जबसे पता चला है उसे, लोग दामाद ढूंढ रहे हैं सरकारी।
By Rajesh Kumar Verma

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