"वो हम पर अपनी जान लुटाते है || "
By Vidhi Maheshwari
जो हमारी हर खुशी मे मुस्कुराते है,
के जिनके गोद मे हम फुलों से खिल खिलाते है,
के जीनके साए मे चलकर हम इतराते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
कभी खुद से जुदा हमे होने नही देते,
कभी गम के साए हम पर पडने नही देते,
के जो हमारी राहों मे फुल बिछाते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
हमारी हर इच्छा का खयाल रखते है वो,
हमारी हर ख्वाईश का मान रखते है वो,
के जो हमारे लिये हर संघर्ष से गुजर जाते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
हमे चोट लगने पर दर्द होता है उन्हे,
हमे दुख हो तो पीडा होती है उन्हे,
के जो अपने क्रोध मे पीडा को छुपाते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है ...
हमारी हर खुशी का जश्न मनाते है वो,
हमारी हर कामियाबी पर नाज़ करते है वो,
के जो हमपर खुदको वार जाते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
हमसे उनका रिश्ता किसी पेड और टहनी सा है,
के जो पतझड मे भी जुडी हो तो बहारो में खिलती है,
और जो सावन मे भी जुदा हो तो नष्ट हो जाती है,
के इसी लिये जो हमे खुदसे जोड कर रखते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
हमारे होने का गुमान करते है वो,
हमारे होने से खुदको भाग्यशाली समझते है वो,
के हमारे हक़ से ज्यादा हमारे लिये कर जाते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
जिनकी हँसी हमारी हँसी से होती है,
जिनके आँसू हमारे आँसू से है,
के हम जिनके अंश है पर वो जो हमे अपनी जिंदगी समझते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
किससे करे हम उनकी तुलना,
के हो पाये हमे उनके महत्त्व की कल्पना,
क्या ईश्वर और क्या कुदरत, इन सबसे उपर जो निकल जाते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
हमारा अस्तित्व जिनसे है,
वो हमसे नही, हम उनसे है,
इस बात का जो ना कभी एहसास कराते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
जिनका आसरा हर इबादत से बढकर है,
जिनकी पनाह हर जन्नत से बढकर है,
के जो हमारे "माँ- बाप" केहलाते है,
वो हम पर अपनी जान लुटाते है...
वो हम पर अपनी जान लुटाते है....
By Vidhi Maheshwari

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