वो सपनों को नहीं चढ़ा पाई
By Akshita Goyal
मेरी माँ बनने से पहले
मेरी माँ क्या रहीं होगीं
मुझे दुनिया मे लाने से पहले
उसकी भी तो एक दुनिया रहीं होगीं
कभी उसने भी कुछ बनने के सपने देखे होंगे
मेरे लिए नहीं, कुछ तो ख्वाब सिर्फ अपने देखे होंगे
इन सपनों को, पूरा करने को, वो भी बेक़रार रहीं होगी
उसे भी बस थोड़े से वक़्त, थोड़ी सी इजाजत ,
और थोड़े से भरोसे की दरकार रहीं होगी
आज भी माँ की आखें ये बेक़रारी बयान करती है
जब वो ये थोड़ी सी चीजें, मेरे लिए जमा करती है
अब समझती हूँ मैं, माँ झुंझलाती क्यूँ है 'सब रख लेना', बार बार याद दिलाती क्यूँ है वैसे मेरी माँ बहुत माहिर हैं सहेजने में थोड़ी सी जगह में बहुत सारा सामान रख देने में क्यूंकि माँ ने भी कभी ऐसे किसी सफर की तैयारी की होगी पर वो कहा रखती सपने, बक्से मे सारी जगह तो जिम्मेदारी की होगी हमेशा की तरह , इस मसले का भी, माँ ने कोई तो हल निकाला होगा सपने नीचे रख के, बक्से को अच्छे से सम्भाला होगा सोचा होगा पहले बक्से को रख देते हैं गाड़ी में सपने ले आऊंगी मैं दूसरी बारी में जब सपने लेने दौड़ी वो, रेल के पहियों पर आखें गढ़ा के अपनी जरूरतें कम कर दी उसने, जिंदगी से उम्मीदे बढ़ा के पर ये जिंदगी की रेल, रुकने का समय नहीं बढ़ा पाई सीटी बजी, रेल चली, माँ डिब्बे में चढ़ा गयी, पर सपनों को नहीं चढ़ा पाई
By Akshita Goyal

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