वो मासूम बेचारे
By Ateet Maurya
सड़क पर एक किनारे,
थे मासूम बेचारे,
दूनिया के रीत से,
वो बेखबर,
भोली आँखों में,
आस लिये,
निष्ठुरों के आगे,
हाथ पसारे।
थे कुछ अजनबी,
खेल रहे ,
किस्मत जैसे,
उनके साथ,
कभी इधर, कभी उधर,
वो भी दौड़ रहे,
करते भी क्या?
पेट में तो थी आग।
औंधे मुहँ गिरी थी,
इन्सानियत,
उस दिन जल रही थी,
कुछ मासूमियत,
थक कर अब वो,
चूर थे,
फिर भी कुछ न आया,
वो मजबूर थे।
अन्धकारमय हो गये ,
कितने बचपन!
छीन लिये गये ,
सारे रंग,
शिक्षित होकर भी हम,
कितने अनपढ ?
कोइ नहीं है,
उनके संग
By Ateet Maurya

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