वो नदी
By Dr Meenakshi Saini
वो नदी बहुत शांत सी
बह रही थी सुकूनियत से
गर्व से थी चल रही
कितने ही घने जंगलों
और ऊंचे पहाड़ों के बीच
था विश्वास अपने पर
और संयम भी अपनी चाल में
जोश था उसे बहुत
समुद्र को जाकर मिलने का
चाल में थी उसके तेज़ी
और दिल में था बहुत जुनून
खुशी और प्यार का
अजीब सा था इक संगम
चलकर कई मीलों के रास्ते
जब पहुंची वो मंज़िल के करीब
सामने देख विशाल समुद्र
खुशी जैसे लुप्त हो गई
कुछ समझ ना आया उसको
दिल को बहुत टटोला तब
डर था एक जो जाग गया
रोक रहा था उसकी चाल
बेचैनी थी बहुत अजीब
खुद को खोने का डर था
लग रहा था रोक लगेगी
उसकी अब आजादी पर
प्यार जो था समुद्र के लिए
वो दुविधा में बदल गया
किया तब उसने सोच विचार
दिल को भी समझाया तब
इतने लंबे सफर का फिर
जोश और महत्व जगाया सब
जाना तब उस नदी ने
ये डर नहीं बेचैनी है
नए सफर पर चलने और
आत्मसंग होने की
एक छोटी नदी से अब वो
विशाल समुद्र बन जाएगी
अब उसकी वो थमी सी चाल
लहरों में बदल जाएगी
फुर्र हो गया उसका वो डर
था जो कन कन में बसा
फिर चाल को दी उसने रफ्तार
और बहाव में तेज़ी भरी
झर झर करके वो नदी
समुद्र में समा गई
अब थी तेज़ी चाल में
और ऊफ़ान पर था बहाव
नए इस बदलाव की वो
खुशी जैसे हो दिखा रही
दिल के अपने हर डर को
जब कर लेते हैं काबू हम
तो खुल जाती हैं कई राहें
और मिलती है नई मंज़िल भी
हर बदलाव लाता तो है
दिल में डर का एक बवंडर
पर है जरूरी इसे समझना
तभी तो मिलेगा हमें समुंद्र
तभी मिलेगा हमें समुंद्र।।
By Dr Meenakshi Saini

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