वो चांद मेरे ख़्वाब सा है।
By Sanchita S K Behera
वो चांद मेरे ख्वाब सा हैं......
जो कुछ खोया सा हैं,
कुछ पाया सा हैं,
दाग़ भी जिसने खुद पर गुरूर से सजाया सा हैं,
अंधेरे में भी जो किसी नूर सा हैं।
खुद रात जगकर उसने नहीं बताया की किस तरह उसने रात काटी हैं।
कितनों के आंसू देखे उसने,
हर रात गुजर जाती हैं,
वो वहीं रहता है,
कितनों ने उसके साथ रात ये काटी हैं।
कोई जो खुद से भी थक जाएं,
तो सुकून का सहारा बनू शायद ऐसा ही कुछ कहना चाहता हैं।
हां, हैं वो कुछ बेख्वाफ – बेहद,
हां, वो चांद मेरे ख्वाब सा हैं।
By Sanchita S K Behera

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