वो चौपट खेल
By Shaily Singh
आज सवेरे हस्तिनापुर की,
शोभा ही निराली है।
महल में मौजूद आज,
स्वयं पांडव और पांचाली है।
राज्य तो बड़ा खुश है,
सभा की रौनक भी नयी है।
स्त्रियों की उपस्थिति नदारद है,
षड्यंत्र की किसी को भनक नहीं है।
और यूँ ही बातों बातों में,
बिछ गया चौसर का खेल।
लो ये चली शकुनि ने चाल,
भला पासों में उसका क्या मेल।
हारे युधिष्ठिर बाज़ी पे बाज़ी,
छिन गया उनसे इंद्रप्रस्थ।
मन ही मन हर्षाए कौरव,
बेजोड़ था मामा का अस्त्र!
हारे राज्य, हारे भाई,
हारे स्वयं को धर्मराज।
थमा ना लेकिन खेल अनूठा,
धरी ताक पर राज्य की लाज!
शुरू हुआ अब दौर आख़िरी,
लगी दांव पर द्रुपदकुमारी।
सांसे रोके, दिल को थामे,
देख रही थी दुनिया सारी।
उछले पासे बिछी वो बाज़ी,
पर कहाँ कोई शकुनि का सानी?
मुस्काया भांजे को देख वो,
हारे पांडव अपनी रानी।
दु:शासन ने की अगुआई,
कर्ण ने भी किया अपमान।
विदुर, विकर्ण का विरोध भी,
रख न सका द्रौपदी का मान।
फिर हुआ उस धर्म-कुटिर में,
इक अबला पर अत्याचार।
भीष्म, द्रोण, धृतराष्ट्र ने भी,
सुनी न उसकी करुण पुकार।
अरे! ओ राजसी देवताओं,
ठुकराया धर्म, किया कर्म को मैला
अब किया तूने नारी को क्रुद्ध,
अब तो तेरी वंश मिटेगी
होगा महाभारत का युद्ध!
By Shaily Singh

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