वो खटखटाहट
By Dr Meenakshi Saini
आज सुबह जब मैं उठी
तो शोर था चारों ओर
दरवाज़ा कोई खटखटा रहा
ऐसा था महसूस हुआ
खोला मैंने जब दरवाज़ा
और देखा चारों ओर
दूर दूर तक था नहीं कोई
जिसने भी खटखटाया था
दरवाज़ा इतनी ज़ोर से
पलटी मैं और करने लगी
दरवाज़ा बन्द जब फिर
तभी आया कहीं से
हवा का बहुत ज़ोरदार झोंका
सर्र से वो गुजर गया
मेरे बहुत करीब से
और घर में मेरे वो भर गया
फैल गया बस सब ओर
तभी बाहर कड़की बिजली
और बरसने लगा झमाझम पानी
भीनी भीनी बारिश की खुशबू
उस हवा संग घर में रम गई
अब आया समझ
वो सब माज़रा मुझे
दरवाज़ा खटखटाती हवा
क्या कहना चाहती थी तब
इतने खूबसूरत मंज़र से
रह जाऊं ना मैं कहीं वंचित
इसीलिए वो ज़ोर ज़ोर से
दरवाज़ा मेरा खटखटाती रही
बहुत ही मनमोहक थी
हवा, बारिश और बिजली की
कानों को सुहाती हुई
वो बहुत सुरीली सी सरगम
रंग था आकाश का
बहुत मंत्रमुग्ध करने वाला
पेड़ों की टहनियां भी
थीं साथ में सुर मिला रहीं
सीखा मैंने आज कुछ
बहुत काम का और नया
कि हर होती हुई खटखटाहट
चाहे दरवाज़े पर हो या मन की
हमेशा एक सुन्दर नज़ारे से
वो हमें रूबरू कराती है
जरूरत है तो उसे सुनने की
उठ कर दरवाजा खोलने की
फिर तो वो सब हवा प्यार की
हर कोने में बस जाती है
जरूरत है तो सिर्फ और सिर्फ
समय पर खटखटाहट सुनने की
समय पर वो खटखटाहट सुनने की।।
By Dr Meenakshi Saini

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