वो ख़त
By Suchita Joshi
आज भी मैंने रक्खे हैं
ख़त वो संजो के
जो तूने कभी प्यार की
हसीं स्याही से लिक्खे थे
आज भी उन ख़तों का
हर एक अल्फ़ाज़
मेरे दिल की गहराईयों मेें
सुर्ख़ लहू सा ताज़ा है
आज भी उन ख़तों में बसी
तेरे इश्क़ की महक
मेरे जिन्दा रहने के लिए
सांसों से भी ज्यादा है
आज भी उन ख़तो की सिलवटों से
धूमिल हुए अल्फाजों में
हमारे अधूरे मिलन का
किस्सा कहीं समाया है
आज भी उन ख़तों को तहाके
रखती हूं सिरहाने में
ख्वाबों में ही सही
वस्ल-ए-यार की उम्मीद
दिल में अब तलक बकाया है
By Suchita Joshi

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