वो एक लड़की
Updated: Dec 2, 2022
By Bhanupriya
अपने शहर के फेरे में फितरतन मैं उसकी गली से जरूर गुजरता हूँ। अक्सर झरोखें में बसंती मुस्कान लिए दिखती थी वो। कभी फोन पे बतियाते तो कभी पड़ोसी सहेलियों से हँसी ठिठोलियाँ करती। नाम तो मैं नहीं जानता पर खूबसूरत इतनी के क्या कहूं,,! खिड़की पर खड़े हवा के झोंके के साथ, उसकी जुल्फें जो मगरूरियत से उड़ती ओर जो पासबनी में उंगलिया आगे आती, नज़ारा अप्रतिम होता था। और उसकी नज़र, उसकी एक नज़र तो किसी बर्फ़दार बारिश से कम न थी। नए खिले फूलों सी ताज़ा वो मुझे सर्द रात सी लगती थी, शांत और शोख। और नतीजतन मेरे लिए किसी हूर से कम नहीं थी वो।
उससे मेरा कोई संबंध नहीं था। या यूं कहूँ की जान पहचान तक नहीं थी। और एक तरफा प्यार तो बेशक़ मैं नहीं कहूंगा। पर हाँ.. हर छुट्टी में घर के दौरे पर उसकी गली से गुजरना और उसे नजर भर देखना जरूरी हुआ करता था।
लेकिन इस दफा देखा तो खिड़की पर कोई नहीं था। दरवाज़े पर भी ताला नज़र आया। मन बेचैन था। ...आखिरी बार पिछले जाड़े में देखा था उसे, चेहरे का रंग उड़ा सा था और बदन बेजान लगा। न फोन पर बात कर रही थी न सहेलियों से मज़ाक। चेहरे पर हँसी तो दूर। आँखे लाल थी। कईं दिनों तक रोइ थी वो शायद। या सोइ नहीं होगी। पथराई आँखों से बस एकटक रास्ता देख रही थी। शायद किसी का इंतजार था उसे।
...पर अब वो यहाँ नहीं रहती। सुना है! पिछले महीने खुदखुशी कर ली। प्यार में किसी ने धोखा दिया। कोई झूठ फिर एक जान लील गया।
अगली दफ़ा स्टेशन से घर जल्दी पहुंच जाऊंगा शायद। इस गली का फेरा तो अब ख़त्म हुआ...।।
By Bhanupriya

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