वो एक लम्हा
By Amit Sagar
वो एक लम्हा जब हम दोनो साथ थे
दिल दोनो के धड़क रहे थे, एक से ज़ज्बात थे
रूह तड़फ रही थी दोनो की एक-दूजे से मिलने को
और मन बैचैन था कुछ कहने-सुनने को
शमा सिर्फ एक ही रौशन थी, उस अंधियारे कमरे में
साँसें साँसों से टकरा रहीं थी, जैसे आग लग रहीं हो सीने में
वो तेरा मेरे पास आकर धीरे से घूँघट उठाना
वो मेरा धीरे-धीरे तेरी बाँहों में सिमट जाना
वो एक लम्हा जब हमारी धड़कने भी एक थी
तेरे इश्क़ के दरिया में, मैं बह गयी बस रेत सी
वो एक लम्हा आज भी मेरी आँखों में बसता है
दिल मेरा आज भी उसी प्यार को तरसता है ॥
By Amit Sagar

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