वृद्धावस्था
By Dr. Suboohi Jafar
दूर पहाड़ के पीछे, तैरता सूरज, क्षितिज पे जा के डूब रहा है,
शाम चीख़-चीख़ कर पुकार रही है, पर रात का घना अंधेरा छा रहा है,
कह रहा है कि ढलते समय तो सूर्य भी पश्चिम में रह जाता है,
उदास, थका हारा, बस आख़री पथ पर बढ़ जाता है।
रात के प्राचीन तारे भी उस वृद्ध को सांत्वना दे रहे हैं,
अपने टूटे तारों का वृत्तांत उस वृद्ध को सुना रहे हैं,
बता रहे हैं कि मनुष्य का जीवन पूर्णिमा की सम्मोहक रात के समान है,
युवावस्था और प्रौढ़ावस्था क्षण में विलुप्त हो जाते हैं।
अब उस वृद्ध को याद आ रहे हैं, वो गुलाबी दिन,
जिन्हें उसने अपने प्रण और संकल्प के दबाव में व्यर्थ कर दिया,
वो पल, जो ओस के थे, जो शहद जैसे मीठे थे,
उन पलों को लालच के घूँट से कड़वा-कसैला बना दिया।
जीवन भर, दरिद्रता के घावों को भरने की सुश्रुषा करता रहा है,
परंतु आज मृत्यु उसे टकटकी लगा कर घूर रही है,
अट्टहास कर रही है, हर एक बीतते पल के साथ,
मानो अनेक मधुमक्खियाँ एक साथ भिनभिना रही हैं।
वह सोच रहा है की काश बीते हुए पल में वापस लौट सकूँ,
स्वयं को जाकर बतलाऊँ कि आज में जीना कितना आवश्यक है,
अपने ऊपर से रात की गहरी काली चादर हटाऊँ,
और देखूँ, कि सूर्य के पूर्व से उगने का दृश्य कितना मनमोहक है।
परंतु वह वृद्ध जानता है कि यह असंभव है,
अपनी अगली पीढ़ी को वह इस सत्य से अवगत कराना चाहता है,
परंतु आज के युवा, उस वृद्ध की बात को तरजीह नहीं दे रहे हैं,
एक दिन इनको इस सत्य का ज्ञान होगा, यह सोच वह वृद्ध मुस्कुराता है।
लेकिन इस मुस्कुराहट में प्रसन्नता नहीं, अपितु दर्द छुपा है,
रात के आख़री जज़ीरे के समान, वह धीरे धीरे विलाप कर रहा है,
अपनी ही यादों के जंगल में चुपचाप कराह रहा है,
अपने पूर्वजों को याद कर, बस शून्य में देख रहा है।
By Dr. Suboohi Jafar

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