वृंदावन
By Minal Satav
क्या याद हैं तुम्हे
मैने खत मैं एक बार वृंदावन के इस घाट एक तस्वीर भेजी थी।
और तुम्हे ने बदले में लिखाता की
जहा जहा राधा कृष्ण कि हसी खिलखिलाई होंगी वहां हम भी खिलखिला उठेंगे वजह बेवजह।
तुम राधां कि तरह सजना में कृष्ण की बासुरी सा सुरीला बन जाऊंगा।
तुम्हने कहा था ना।।की यहां की हर घाट पर शाम ढलते तुम मुझे कहानियां सुनाओगे।
चांद तारों की रोशनी को मेरी आंखों में देखो गे।
सिरहाने मैं सो जाऊ तुम्हारे तो
तुम घाट के पानी को निश्चल कर खामोश होने की बिनती करोगे।।
और जब सुबह हो जाए ते पानी की चमक को मेरी बिंदी बनाओगे
मैं ने जवाब में लिखा था की एक तस्वीर तुम्हे कवि बना गईं।
तुम्ह ने कहा था , तस्वीर नही है ये बस , प्रेम को प्रेम के घर मिलने की ख्वाइश हैं तुम्हारी।
अब वो दौर गुजर गया ।
तुम्हन्ने तस्वीर खो दी होगी शायद।।।
क्योंकि वृंदावन ने मुझे हर रोज देखा हैं।
तुम्हे भी देखा होगा शायद पर इसी वृंदावन ने हमे देखा नहीं।
By Minal Satav

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