विषाक्त
By Ashish Priyadarshi
कुछ ज़हर दबाए होठों में,
वो घात लगाए बैठे हैं |
चांदी की केंचूली में सिम्टे से,
वो फन फैलाए बैठे हैं ||
लिपटे थे वो कब कस गए !
रिश्ते बन कर ही डस गए |
फ़िर खुन भी सारा ज़हर हुआ,
वो साँस चुराए बैठे हैं ||
By Ashish Priyadarshi

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