विध्वा
By Narjeev Singh
जो वह चाहती है
वही वह कहती है
फिर क्यों उसकी रंग-बिरंगी ज़िन्दग़ी
रेगज़ार सी हो जाती है
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x
उसका क्या दोष है
क्यों उसकी ज़िन्दग़ी बंज़र बन जाती है
मौसम बसंत का है
फिर क्यों वह पतझड़ में रहती है
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x
था उसका कभी हर जगह से नाता
फिर क्यों आज वह चार दीवारो में रहती है
क्यों कहीं वह जा नहीं सकती
क्यों वह बन्दिशों में रहती है
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x
आया मौसम सावन मिलन का
हर औरत कहती है
फिर क्यों वह ही किवाड़ के पीछे रहती है
थी बेपरवा कभी उसकी भी ज़िन्दग़ी
फिर क्यों आज वह बंधन में रहती है
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x
लपेट दिया है उसे सफेद चादर में
जो मुर्दो को पहनाई जाती है
अब न उसके चेहरे में श्रृंगार है
न हाथो में चूड़िया रहती है
हर विध्वा कुछ कहती है - 2 x
By Narjeev Singh

Comments