वात्सल्य की छांव
By Yogesh Kumar Pradhan
जब मैं रोया था पहली बार,
सुना तू खूब खिलखिलाई थी।
तेरे चेहरे पर हंसी, मोद से
कुछ आंखें भी भर आई थी।
फिर क्यों रोती है आज की जब
अब दर्द मुझे कुछ होता है,
क्यों टीस देख मेरा,तेरा मन
चेतनाशून्य न सोता है।।
क्यों अपनी नींद का सौदा कर
तू मेरे स्वप्न पिरोती है,
सच कहते हैं लोग की आखिर
मां तो मां ही होती है।।
हांथ थाम तेरा ही तो
चलना मैंने सीखा था,
धरा भंवर में प्रीत सहेज
पलना तुझे सीखा था।
तू गुरु समान,मेरे हित अज्ञान
का नाश किया तूने ही,
मैं था अमोघ,नित प्रीति योग
का पाठ दिया तूने ही।
तू ही है मेरा परम धन
मग तेरे क्या मोती है,
सच कहते हैं लोग की आखिर
मां तो मां ही होती है।।
By Yogesh Kumar Pradhan

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