वस्तविकता
By Gulab Chandra Mishra
व्यक्ति की पहचान जब कपड़े से होती है,
मंच की शोभा जहाँ पर्दे से होती है;
जिंदगी नेपथ्य की क्या खाक दिखती है!
दर्शकों की आँख में बस धूल पड़ती है||
आवरण का भार भी क्या भार होता है!
रूप का श्रृंगार कैसे रूप देता है!
देखलो दर्पण में अपना रेशमी चेहरा;
आईना भी आपसे कुछ झूठ कहता है||
अंदर से बाहर देखना आसान है कितना,
बाहर से अंदर देखना दुश्वार होता है।
प्रेम की भाषा, अभी तक क्या लिखी किसीने;
यह तो सहज स्वीकार में आभास होता है||
बीते दिनों की याद अब मुझको सताती है,
जिंदगी लगती है जैसे दूर जाती है।
अपने सफर की राह में कोई मोड़ है नहीं;
देखो क्षितिज की दूरियाँ बढ़ती ही जाती है||
सत्य की आवाज़ को पहचानता है कौन,
जो स्वार्थ के शब्दार्थ में सविकार है?
या फिर वही, जिसके लिए
यह सत्य सीधा सा सरल स्वीकार है||
By Gulab Chandra Mishra

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