वरदान
By Mukesh Kumar Badgaiyan
मैं रोज सूर्य प्रणाम करता हूँ
उससे पहले भ्रमण करता हूँ
मैंने सुना था सेवा से सब प्रसन्न होते हैं
प्रसन्न होकर कुछ न कुछ देते हैं
एक दिन
सूर्य भगवान भी मुझ पर प्रसन्न हो गये
कुछ देने के लिए उदत्त हो गये
वे बोले मांगों कोई वरदान
मैंने कहा दीजिए श्रीमान् !
वे बोले क्या इच्छा है
मैंने कहा बाकी तो सब अच्छा है
यदि आप कर सकें तो
इतना कर दीजिए
हवा और पानी में ईमान डोल दीजिए!
मेरे जो सुने सूरज ने बोल
तो वे फौरन हो गये गोल !
तब से अब तक मैं वहीं पर खड़ा हूँ
वरदान की आशा में तस्वीर साफ जड़ा हूँ
वरदान की आशा में तस्वीर साफ जड़ा हूँ।
By Mukesh Kumar Badgaiyan

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