वरदान
Updated: Jan 12, 2023
By Aditya Jha
हे प्रभु देना ऐसा वरदान
बनूँ धीर, वीर, महान ।
पर इतना महान न बना देना,
लोग बना दें देवता !
और जड़ कर दें
मंदिर मूर्तियों में, बनाकर पाषाण ।
मैं हो जाऊं दूर ,
स्वजन, वंचित, अकिंचनों से ।
नहीं है चाह मेरी -
बैठा रहूँ कल्पतरु नीचे ।
ईच्छा मात्र से ही उपलब्ध हो,
संसार की कामनाएँ ।
नहीं है चाह मेरी -
सिंहासन आरूढ़, कर्म विरत देखूं ।
उत्तेजक अदाओं, विलासी नयन युक्त
अप्सराओं का मोहक नृत्य !
प्रभु भर दो अपनी शक्ति से
मेरे ये भुज दण्ड ।
जो काम आ सके
खेतों और खलिहानों में,
ऊपजाने, पँहुचाने को अन्न, आसरा ।
कर दो कंधे इतने सबल,
की उठा सकूँ बोझ
कृशकाय दीन समाज का ।
वातानुकूलित वातावरण से
नहीं, ईर्ष्या मुझे ।
पर मिले दो जून रोटी
क्षुधा व्याकुल हर पेट को ।
जले ज्ञान दीप हर झोंपड़ी में ,
लड़ी खुशियों की बने, न आँसुओं की ।
प्रभु करना इतनी कृपा
निगले न चौथाई समर्थ
तीन चौथाई वंचितों को ।
वजूद है फलते, फूलते
शेर, व्हेल, शार्क का
जब भरता कानन में कुलाँचे
गिलहरी, मृग शावक, शशक ।
नदियों ताल तलैयों में मगन नाचती
सोन मछरी, सरीसृप, कच्छप !
By Aditya Jha

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