वक़्तसे कौन जीता है
By Mahendra Dhirajlal Kamdar
वक़्तकी मिट्टीसे कौन बना है, वक़्तकी भट्टीमें सबकुछ फ़ना है,
इन्सान तो क्या चीज़ है, वक़्तके दरबारमें फ़रिश्ते भी अदना है,
ए बन्दे, वक़्तसे इस जहाँमें कौन जीता है,
किसी औरके अश्क यहाँपे कौन पीता है,
कौन है यहाँ, ग़म जिसका रिश्तेदार नहीं,
इस मैख़ाने में, साक़ी किसीका यार नहीं,
जर्फ़-ए-मसर्रत-ओ-ग़म कम मिलता नहीं,
फ़रिश्तेंभी कौन है, जिसे ग़म मिलता नहीं,
हर आनेवाला, यहाँ वक़्तके हाथों पीटा है,
कुछ शराबके, कुछ जहरके जाम पीता है,
यही सिलसिला ज़िंदगीमें सबकी जारी है,
आज नहीं तो कल, आती सबकी बारी है,
तू गर चाहे तो, सारा जहान हासिल करले,
पर जहान फ़ानी है, ज़ेहनमें शामिल करले,
आँख खुलते ही, ख़्वाबों को रूठ जाना है,
मुट्ठी खुलते ही, जो पाया है छूट जाना है,
पिंजरा टूटते ही रूहका पंछी उड़ जाता है,
काइनात-ए-ख़ुदाही उसकी दिल-सिताँ है,
कौन है यहाँ, जो ज़ख्म-ए-दिल सीता है,
वक़्त-ए-रुख़्सत सबका तन्हाईमें बीता है,
नियति बड़ी बे-वफ़ा मा'शूक़ा महबूबा है,
तुझे बनाना-मिटाना ही उसका मंसूबा है,
आज पलकें बिछाती है, जो तेरी राहों में,
याद रख, कल वो होगी औरोंकी बाहों में,
तू है या नहीं, दुनिया यूँही चलती रहती है,
वक़्त-धारामें ज़िंदगी यूँही बहती रहती है,
नामवर कैसेभी हो, तय है बे-नाम होना है,
वक़्त के पन्नों में, तय है गुम-नाम होना है,
ज़िन्दगी और मौत तो जैसे दिया-बाती है,
आख़िर तो ज़िन्दगी मौतसे मिल जाती है,
मौतसे यहाँ एक दिन सबका मेल होता है,
बंदो, ज़िन्दगीसे आगे यहाँ कौन जीता है,
हुस्न-ओ-जवानी पर आज गर इतराएगा,
आईनेसे एक न एक दिन जरूर कतराएगा,
आज जो शोहरत-ए-तख़्तपे तुजे बिठाएंगे
कल वही लोग औरोंके लिए तुजे भुलाएंगे,
जो भी रिश्ते नाते है, सारे ज़फ़रमें साथी है,
'अली'ही तेरा है, जो सारे सफ़रमें साथी है,
संसारकी कोई शय है? जो साथ आनी है,
साँसोंका मोहताज है, और साँस फ़ानी है,
फिर क़दमोंकी आहट न साँसोंका शोर है,
बस न ख़त्म होनेवाली ख़ामोशीका दौर है,
इसलिए कहता हूँ, अजलसे नाता जोड़ ले,
जहान-ए-फ़ानीकी हर शयसे नाता तोड़ ले,
साँस रहने तक, कुछ और नवाफ़िल करले
हश्रके आने तक, कुछ और वसाइल करले,
सारे जहानके तख़्त-ओ-ताज जो जीता है,
बेशक वक़्त-ए-हश्र तख़्त उसीकी चिता है,
अदना हो या अवतार, अंत एक सा होता है,
सूफ़ी हो या "काफ़िर", अजलमें वा होता है,
ए बन्दे, वक़्तसे इस जहाँमें कौन जीता है,
किसी औरके अश्क यहाँपे कौन पीता है.
By Mahendra Dhirajlal Kamdar

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