वक़्त
By Jyoti Singh
जब भी मन करता है, चले आते हैं
इन विचारों की आवाजाही में,
मैं भी कुछ वक़्त-बेवक़्त सी हो गई हूँ
समय महसूस करने के लिए,
अब समय ही नहीं मिल रहा है
वक़्त जो दिया गया था,
वो भी तेज़ी से निकल रहा है
चौबीस घंटों में अब किसका गुज़ारा होता है
ये कम्बख्त इंसान, हमेशा बस रोता ही रहता है
कुछ याद है,
आख़िरी बार कब पंखे को घूमते हुए देखा था,
पेड़ से गिरते उन पत्तों को, आख़िरी बार कब देखा था
आख़िरी बार कब घड़ी की टिक-टिक सुनाई दी थी,
और आख़िरी बार कब उस चांद को निहार कर देखा था
अब ज़रा थम भी जाओ, थोड़ा रुक भी जाओ
अरे भाई !
ज़रा चैन की सांस ले लो
लो बैठो यहाँ, थोड़ा पानी भी पी लो
थोड़ी देर आराम कर लो,
यहीं इसी चारपाई पर,
फ़िर निकल जाना तड़के,
उस दौड़ में शामिल होने
उस दुनिया में वापस जाने,
जिसे तुम ज़िंदगी कहते हो ||
By Jyoti Singh

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