लोगो की ग़लतफहमी
By Sonu Sharma
तलब सकून की है सबको
पर तलाश-ए शोहरत में मर रहे हैं
किसी ग़लतफहमी में लोग
ना जाने क्या क्या कर रहे है
भाग रहे है ना जाने ये कैसी होड़ में
जीना ही भूल जाते है कमाने की दौड़ में
उधार की ज़िन्दगी की जैसे किस्तें भर रहे है
किसी ग़लतफहमी में लोग
ना जाने क्या क्या कर रहे है
खुद को सबसे बेहतर बताते फिरते है
सबसे ऊँचा उठते उठते कितना नीचे गिरते है
दिल सड़ता जा रहा है और चेहरे सँवर रहे है
किसी ग़लतफहमी में लोग
ना जाने क्या क्या कर रहे है
मज़हब बना रखा है जरिया कमाई का
रब बनता जा रहा है क्यों मुद्दा लड़ाई का
झूठे बने फ़रिश्ते और सच्चे डर रहे है
किसी ग़लतफहमी में लोग
ना जाने क्या क्या कर रहे है
By Sonu Sharma

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