लोकतंत्र
By Dr. Rohit Kumar
झूठ पर सच का वर्क जो लगने लगा है,
लोकतंत्र भी बाजार में बिकने लगा है… !
अवरोध की जड़ो को क्यों काटना,
नफरतों से भी वोट खूब गिरने लगा है
तुम सफाई अपने मत की- मत रख देना,
देश द्रोहियो का किस्सा बढ़ने लगा है,,
बात हुई थी विकास की -बेरोजगारी की,
महंगा विकास, रोजगारी पर भारी पड़ने लगा है,
राजशाही खाने के सस्ती सी कीमत ,
कितने रोजी रोटी को निगलने लगा है… .!!
राजनीति का भी धर्म कभी सुना था,
धर्म में राजनीति का असर दिखने लगा है… . !
सरकार लोकमत की कहा सुना करती है,
सरकारीतंत्र में निजीकरण बढ़ने लगा है..!
हमें उलझा कर रख दिया फिजूल की बातों में
कहते हैं लोग सम्भल जाओ,
व्यापारियों से देश चलने लगा है… .!!
By Dr. Rohit Kumar

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