लाढ़ली
By Arvinder Kaur
बाबुल की लाढ़ली, मैया की लाढ़ली
थी मैं बहिना भैया की लाढली,
तेरे घर ब्याह के आयी थी जब
थी सब की लाढ़ली मैं दुलारों से पली।
सपने कई आँखों में संजोए
उम्मीदें बहुत सी दिल में पिरोए,
तेरे घर ब्याह के आयी थी जब
थी सब की लाढ़ली मैं दुलारों से पली।
दहलीज़ मेरे घर की, डोली उठते ही,
पीछे छूट गई।
तेरी दहलीज़ के भीतर आ कर,
मेरी मैं ही मुझसे रूठ गई।
तेरे घर ब्याह के आयी थी जब
थी सब की लाढ़ली मैं दुलारों से पली।
आपा नयौछावर करके भी,
तुझको अपना मैं बना न सकी।
लगने लगी थी ज़िन्दगी,
मानो रूकी रूकी।
तेरे घर ब्याह के आयी थी जब
थी सब की लाढ़ली मैं दुलारों से पली।
अधूरी ख़ाली ज़िन्दगी
अब लगने लगी है फिर प्यारी,
जब से आ गई मेरी गोद में
नन्ही कली मेरी रानी परी।
देख देख अपनी बिटिया को
जीने का जी करता है,
इसकी भोली मुस्कान में
मेरा दिल हँसता है।
जीवन से भरी प्यारी सी कली,
मेरी है लाढ़ली जो वो तेरी भी लाढ़ली!!
By Arvinder Kaur

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