लम्हा
By Madhumita Patil
उस एक लम्हे की तलाश में हम घूमते रहे,
एक लम्हा जो आके हसा जाए,
एक लम्हा जो आके थम जाए।
पर शायद कोई लम्हा कभी ठहरने के लिए बना ही नही,
ऐसा एक लम्हा जिसमे घर बसा पाए।
ये बिचारा मासूम सा लम्हा tk बस गुजरने के लिए बना होगा,
उस प्यारे लम्हे को शायद ही पता हो,
बेकरार हैं हम उसे रोकने के लिए, उसे अपनाने के लिए,
आज नसीब हुआ है, कल चला जायेगा।
ये जो लम्हा है, आप ही की तरह है,
तम्मनाएं हज़ार है, इस लम्हे में आपके साथ ठहरने की, जीने की,
मगर क्या पता, शायद लम्हे की तरह आप भी चलें जाओगे।
शायद तलाश लम्हे की कभी थी ही नही,
तलाश तो बस आप ही की थी।
By Madhumita Patil

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