लौटकर आऊँगा
By Abhimanyu Bakshi
अच्छा चलता हूँ इक दिन फिर आऊँगा,
वही सपनों-उम्मीदों की बातें फिर सुनाऊँगा।
बूढ़ा हुआ जो घर इक उम्र की तामीर करते-करते,
उसकी दीवारों संग कुछ पल फिर बिताऊँगा।
सिखाया जिसने जीना सलीके मगर लुत्फ़ के साथ,
उसी दिन-चर्या में पूरा दिन बिताऊँगा।
मिलूँगा वही पुराने दोस्तों से क़िस्मत ने चाहा अगर,
पर मिलके वही बचकानी बातें ही दोहराऊँगा।
कोई होगा जिसका दिल मुझसे टूटा रह गया होगा,
उसे किसी न किसी तरीक़े से मनाऊँगा।
इक आईना जिसने ता-उम्र था संवारा मुझको,
उसे अपनी मुस्कान से फिर सजाऊँगा।
यूँ तो वक़्त कभी लौटकर वापिस नहीं आता,
पर उसी वक़्त की तरंगे अपने इर्द-गिर्द बनाऊँगा।
मुकम्मल इंसान बनने का मेरा कोई दावा तो नहीं,
पर अहबाबों से किया वादा हरगिज़ निभाऊँगा।
By Abhimanyu Bakshi

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