रोटी, मल्बा और मकान
By Vani Bansal
मैं मेरे घर के सामने कुछ दिनों से एक घर को टूटते हुए देख रहीं हूं
पिछ्ले पान्च दिनों मे तीन मन्ज़िलों के उस घर की एक एक मन्ज़िल को
ज़मीन पर गिर्ते देख रहीं हुं
बारी बारी से चार दीवारों को, टकटकी लगाइ खिडकियों को
छत से टन्गे पन्खों को
ज़मीन तक पहुंचते देख रहीं हूं
कुल्हाडी की मार को सन्जो कर रखी गयी ईन्ठों से जूझते हुये देख रहीं हूं
एक घर को मकान में और फ़िर एक मकान को
कुछ रोडी और मल्बे के ढेर में तब्दील होते देख रहीं हूं
धूप में, गर्मी में हाथ में कनस्तर और कुल्हाडी लिए श्रमिकों की पसीने से तर बतर कमीज़ को
उनके सौ रुपए की दिहाडी के लिए दिन की मेहनत को
मूक होके देख रही हूं
अपने आप को मैं कभी कबार छूटे कुछ रिश्तों के
रोडी और मल्बे के बीच पाती हूं
एक त्रिण के भांति उन रिश्तों की दीवारों को, पुराने साज सज्जा के सामान को
टूटी हुई गुडिया को तो बैट्री से चलती गाडी को
दीवार पर लटकी टिक-टिक करती घडी को
मैं रोडी, मल्बे और मिट्टी के ढेर में बदलते जब देख रही होती हूं
तब अपनी अभिलाशाओं को, अपनी अन्गिनत कोशिशों को
उनके झूठे वादों में अपनी अनकही सच्चाई को
अकस्मात धूल बनते, धुएं के छल्लों की तरह छिन्न-भिन्न होते हुए पाती हूं
By Vani Bansal

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