रेत/Sand
By Vidit Panchal
मैं रेत बाँधकर मुट्ठी में
यहाँ से लेकर जा रहा हूँ
अभी थोड़ी नम है
हाथो में ठंडक है।
कुछ देर में ये सूखने लगेगी
मैं इसे और कस के बाँधूंगा
कुछ देर में सफ़र की धूप लगेगी,
ये और सूखेगी
बिखरेगी धीरे-धीरे मुट्ठी के एक छोर से
मैं इसे और जकड़ लूँगा।
फिर चुभेगी कुछ हाथो में
काटने लगेगी मेरी हथेली
मैं खोलूंगा मुट्ठी और
अपने हाथ की रेखाओं पे सजे
इस रेत के बचे दानों को देखता रहूंगा।
इस रेत को आखिर पूरा खिर जाना है,
इसकी ठंडक, इसकी चुभन को नहीं;
उन्हें मेरी रेखाओं में रह जाना है।
By Vidit Panchal

Comments