"रूप एक स्वरूप अनेक"
By Sakshi Joshi
गुलाब के पौधे में कलियों जैसी,
बेटियाँ तो होती है परियों जैसी!
लक्ष्मी का साक्षात रूप,
ममता का स्वरूप!
जिस घर जन्मे,
हो गौरव अनूप!!
हर नारी का पहला रिश्ता,
बेटी से बहु और फिर माँ का दर्जा!
मुस्कान है मुख की लाली,
हो जैसे बागों मे बहार निराली!
जब चुप हो तो, पतझड़ छाए!
प्रार्थना करो देवता से,
की वर्षा की तरह आंसू न बहे!!
पौधे से फूल की,
कली जैसे हो दूर!
बेटी को विदा करे बाबुल!
फूल जैसे देवता को करे अर्पण,
कन्यादान करे सज्जन!!
पौधे से टूटने पर हो पीड़ा अधिक,
माँ-बाप से बिछड़ने का गमक हो अधिक!
देवता के चरणों मे पुष्प जैसे शोभित है,
बेटी से बहु का कर्म अधिक है!
बाबुल के अंगने में मुस्कान की किलकारी दे,
बहू बन ससुराल में जिम्मेदारी ले!!
कन्यादान करे जो जन्म दे,
और जन्म दान तो माँ ही दे!
स्वयं पीड़ा को भूल कर,
ममता का सुख प्रदान करे!
एक पुत्री ही माँ का दुःख हरे!!
पौधे की जड़ों से कलियों का जन्म हो जैसे,
हर आँगन एक बेटी का जन्म हो!
धरती हरियाली छाए,
नारी जाति का गौरव बढ़ता जाए!!
By Sakshi Joshi

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