रूठना-मनाना
Updated: Dec 5, 2022
By Tarif Mustafa Khan
रूठती हो तुम तो मान भी जाया करो,
मेरी जान मुझे यूँ तो न सताया करो।
मोहब्बत के दरमियान नाराज़गी मज़ा देती है,
मगर फ़क़त नाराज़गी ही नाराज़गी हो तो सज़ा देती है।
मेरी तमाम मिन्नतों का जवाब ग़ुस्सा है,
तुम ही कहो मुझसे यूँ पेश आना क्या अच्छा है?
तेरी क़ुरबत तेरी मोहब्बत के सिवा और तो कुछ नहीं माँगा मैंने,
तुझे और तेरे इश्क़ के सिवा और क्या चाहा है मैंने।
ग़लती हुई है मुझसे मैं इस बात का ऐतेराफ़ करता हूँ।
मगर मेरी सफाई भी सच्ची है इस बात पर भी इसरार करता हूँ।
तुम मेरी बातों का यक़ीन किया करो क्यूंकि मैं झूठ नहीं कहता,
मैं दुनिया के फरेब के दरिया में नहीं बहता।
कुछ कहा और नहीं किया मैंने, तो यक़ीन जानो कोई जायज़ वजह होगी उसकी,
तुम्हारे दिल दुखे जिस से ऐसी कोई चीज़ तो मैने ख्वाब में भी नहीं की।
तो जब नींद खुले तो मुझसे मिलने आना,
मैं तुम्हे शिद्दत से सुनूंगा तुम मुझे अपनी कहानी सुनाना।
By Tarif Mustafa Khan

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