रुकना ना
By Sanat Raj
क्यों बैठा शांत तू,
भूल मत महासागर प्रशांत तू,
चिंगारी में मत सिमट तू,
आग को दहकती लपट तू।
माना नश्वर ये प्राण है ये जान है,
पर जब तक जान है जरूरी सम्मान है,
खुद की चमक से अब भी अनजान है,
अरे तू तो हीरे की खदान है।
कल को किसने देखा है,
हर चीज की एक लक्ष्मण रेखा है,
पर कौन यहां खुद को रोक पाया है,
यहां सब पर मोह माया का साया है।
की कर वचन बढ़ा कदम,
रुकेगा तो यू ही निकलेगा दम,
लड़ जा अपने हर डर से,
की मां पिता गर्व से निकले घर से।
By Sanat Raj

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