रीति रिवाज
By Swapna Jyoti
ये रीति रिवाज़
ये रिश्ते नाते
लग रहे हैं सारे बेगाने
मेरे अपने ही कर रहे मुझे किसी और के हवाले।
मेरा घर मुझसे छूट रहा
प्यार लुटा रहे मुझपे पराए
आहिस्ता आहिस्ता रस्में हो रही
लोगों की निगाहों में मेरी डोली उठ रही
कोई मुझसे तो पूछे मेरी नजरों में मेरे जनाजे की सेज सज रही।
चारों तरफ शहनाइयों की गूंज है
हो रहे हैं मेरे हाथ पीले
सुर्ख रंगत आ गई है हथेलियों पे मेरी
जिससे प्यार है मुझे सबसे ज्यादा
वो ही बांध रहा मुझे किसी और के गले।
अपनो के लिए मैं जा रही संवरने
मेरे लिए मैं लगी हूं बिखरने
मेरी ख्वाहिशों का गला घोंट दिया
मेरे सपनों को जीते जी मार दिया
जब दामन छुड़ाना ही था मुझसे तो मुझे निखरने क्यों दिया..?
लगाम ही लगानी थी मुझपे
तो मुझे रिहा क्यों किया..?
तराशा था मैंने खुदको एक मुकाम पाने के लिए
उससे पहले ही सौंप दिया अपनो ने मुझे
किसी और का आंगन महकाने के लिए।
ये तो मेरी बंदगी नहीं
मेरी जिंदगी नहीं
और ऐसी जिंदगी मौत से कम नहीं।
By Swapna Jyoti

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